.

भुगतान संतुलन क्या है और भारत के भुगतान संतुलन में बीमा की क्या भूमिका है जानिए एकदम आसान भाषा में।

भुगतान संतुलन क्या है(what is balance of payment in hindi)

आज के समय में आपने अधिकतर सुना या देखा होगा की भारत इस देश के साथ इतना का व्यापार कर रहा है या भारत ने उस देश को अपना बहुत सारा प्रोडक्ट भेजा है। मतलब की जब दो देशो के बिच लेन देन होता है तो उनके लेन देन के लेखा जोखा को ही भुगतान संतुलन कहा जाता है। 
what is balance of payment in hindi

भुगतान संतुलन का क्या अर्थ है ?

इसे समझने के लिए हम एक उदहारण लेते है मान लीजिये आप जिस गांव या मोहल्ले में रहते है वहां आप अपने पडोसी से लेन-देन करते है। मतलब कभी आपको किसी चीज की जरुरत पड़ी और वो चीज आपके पास नहीं रहता है तो उसे आप अपने पडोसी से मांग लेते है ,और ठीक ऐसे ही आपका पडोसी भी करता है। 
    यही बात बैलेंस ऑफ़ पेमेंट के साथ होता है। लेकिन balance of payment में दो देशो के बीच हुए आयात और निर्यात की गणना होती है। मुख्य रूप से बैलेंस ऑफ़ पेमेंट को शून्य होना चाहिए। तभी माना जाता है की दोनों देशो के बिच आयात निर्यात संतुलन में है। लेकिन ऐसा बहुत कम ही होता है।अक्सर देखा जाता है की  या तो कोई देश अधिक मात्रा में आयात करता है लेकिन निर्यात बहुत कम करता है। लेकिन अधिक मात्रा में निर्यात करना देश के लिए अच्छा होता है। 

    भुगतान संतुलन का महत्व

    भुगतान संतुलन के निम्नलिखित महत्व है :-
    • किसी देश का BOP उसकी वित्तीय और आर्थिक स्थिति को प्रकट करता है।
    • BOP स्टेटमेंट का उपयोग यह निर्धारित करने के लिए एक संकेतक के रूप में किया जा सकता है कि देश का मुद्रा मूल्य बढ़ रहा है या मूल्यह्रास हो रहा है।
    • बीओपी स्टेटमेंट सरकार को राजकोषीय और व्यापार नीतियों पर निर्णय लेने में मदद करता है।
    • यह अन्य देशों के साथ किसी देश के आर्थिक व्यवहार का विश्लेषण और समझने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।
    • इसके बीओपी स्टेटमेंट और इसके घटकों का बारीकी से अध्ययन करके, कोई भी उन रुझानों की पहचान करने में सक्षम होगा जो काउंटी की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद या हानिकारक हो सकते हैं और इस प्रकार उचित उपाय कर सकते हैं।

          भुगतान संतुलन कितने प्रकार के होते है ?

          आयात एवं निर्यात की दृष्टि से भुगतान संतुलन (balance of payment )दो प्रकार के होते है :-
          1. अनुकूल भुगतान संतुलन (favorable balance of payments)
          2. प्रतिकूल भुगतान संतुलन (adverse balance of payments)

          अनुकूल भुगतान संतुलन क्या है ?

          जब किसी देश से आयात की तुलना में निर्यात अधिक होता है तो इसे अनुकूल भुगतान संतुलन कहते है। मतलब की भारत विदेशो से सामान या सेवाएं अपने देश में लाने की तुलना में विदेशो को अधिक मात्रा में देता है तो तब इसे भारत के लिए अनुकूल भुगतान संतुलन कहा जायेगा। अनुकूल भुगतान किसी भी देश के लिए अच्छा माना जाता है। लेकिन यहाँ आयात और निर्यात की तुलना वास्तु के संख्या पर निर्भर न करके उनके कुल मूल्य पर निर्भर करता है। 

          प्रतिकूल भुगतान संतुलन क्या है ?

          प्रतिकूल भुगतान संतुलन अनुकूल भुगतान संतुलन के ठीक विपरीत होता है। कहने का अर्थ है की जब देश से निर्यात की गयी वस्तुओ और सेवाओं का कुल मूल्य देश में आयात की गयी वस्तुओ और सेवाओं के कुल मूल्य से कम होता है तो इसे प्रतिकूल भुगतान संतुलन कहते है। प्रतिकूल भुगतान संतुलन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होता है। 

          प्रतिकूल भुगतान संतुलन के कारण

          प्रतिकूल भुगतान संतुलन के कई कारण है जिनमे से कुछ महत्वपूर्ण कारण निम्नलिखित है :-
          • जनसँख्या में वृद्धि प्रतिकूल भुगतान संतुलन का सबसे बड़ा कारण है। किसी देश की जनसँख्या में वृद्धि होने के कारन उनकी आवस्यकताओ में वृद्धि हो जाती है ,जिससे की देश में जो उत्पादन होता है उसका अधिकतर भाग देश के अंदर ही खपत हो जाता है। जिससे निर्यात कम हो जाता है और प्रतिकूल भुगतान संतुलन बड़ जाता है। 
          • विकसित देशो द्वारा आयात प्रतिबन्ध लगाना भी प्रतिकूल भुगतान का कारण है। वर्तमान समय में कई सारे विकसित देश अपने आयात पर प्रतिबन्ध लगाए है जिससे अन्य देशो का प्रतिकूल भुगतान में वृद्धि होने लगती है। 
          • पडोसी देशो के साथ सम्बन्ध अच्छे न होना भी प्रतिकूल भुगतान का एक कारण है। 
          • आर्थिक विकास करने के लिए अधिक से अधिक अन्य देशो से वस्तुओ और सेवाओं का आयात करना। 
          • सभी देशो द्वारा आत्मनिर्भर और स्वतः उत्पादन करना। 

          भुगतान संतुलन के घटक(Components of Balance of Payment in Hindi)

          भुगतान संतुलन के तीन घटक है जिन्हे हम खाते के नाम से जानते है ,जो निम्नलिखित है :-
          1. चालू खाता
          2. पुंजी खाता 
          3. वितीय खाता 

          चालू खाता क्या है ?

          चालू खाते का उपयोग देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के प्रवाह और बहिर्वाह की निगरानी के लिए किया जाता है। यह खाता कच्चे माल और विनिर्मित वस्तुओं के संबंध में सभी प्राप्तियों और भुगतानों को कवर करता है। इसमें इंजीनियरिंग, पर्यटन, परिवहन, व्यापार सेवाओं, स्टॉक, और पेटेंट और कॉपीराइट से रॉयल्टी से प्राप्तियां भी शामिल हैं। 


          जब सभी वस्तुओं और सेवाओं को मिला दिया जाता है, तो वे एक देश के व्यापार संतुलन (बीओटी) को बनाते हैं। व्यापार और स्थानान्तरण की विभिन्न श्रेणियां हैं जो विभिन्न देशों में होती हैं। यह दृश्यमान या अदृश्य व्यापार, एकतरफा हस्तांतरण या अन्य भुगतान/प्राप्तियां हो सकती है। देशों के बीच माल के व्यापार को दृश्य वस्तुओं के रूप में संदर्भित किया जाता है। 

          और सेवाओं के आयात/निर्यात (बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी आदि) को अदृश्य वस्तुओं के रूप में संदर्भित किया जाता है। एकतरफा हस्तांतरण से तात्पर्य विदेशों के निवासियों को उपहार या दान के रूप में भेजे गए धन से है। यह व्यक्तिगत स्थानान्तरण भी हो सकता है जैसे - रिश्तेदारों द्वारा दूसरे देश में स्थित उनके परिवार को भेजा गया धन।

          पूंजी खाता क्या है ?

          देशों के बीच सभी पूंजी लेनदेन की निगरानी पूंजी खाते के माध्यम से की जाती है। पूंजीगत लेनदेन में भूमि और संपत्ति जैसी संपत्ति (गैर-वित्तीय) की खरीद और बिक्री शामिल है। पूंजी खाते में एक अलग देश से बाहर जाने वाले प्रवासियों द्वारा करों का प्रवाह, अचल संपत्तियों की खरीद और बिक्री आदि शामिल हैं। चालू खाते में घाटे या अधिशेष का प्रबंधन पूंजी खाते से वित्त के माध्यम से किया जाता है और इसके विपरीत। पूंजी खाते के 3 प्रमुख तत्व हैं:-

          ऋण और उधार - इसमें विदेशों में स्थित निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों के सभी प्रकार के ऋण शामिल हैं।

          निवेश - ये अनिवासियों द्वारा कॉर्पोरेट शेयरों में निवेश किए गए फंड हैं।

          विदेशी मुद्रा भंडार - विनिमय दर की निगरानी और नियंत्रण के लिए किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा रखे गए विदेशी मुद्रा भंडार पूंजी खाते को प्रभावित करते हैं।

          वितीय खाता क्या है ?

          वित्तीय खाते के माध्यम से अचल संपत्ति, व्यापार उद्यमों, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आदि में विभिन्न निवेशों के माध्यम से और विदेशों में धन के प्रवाह की निगरानी की जाती है। यह खाता घरेलू संपत्ति के विदेशी स्वामित्व और विदेशी संपत्ति के घरेलू स्वामित्व में परिवर्तन को मापता है। इन परिवर्तनों का विश्लेषण करने पर, यह समझा जा सकता है कि क्या देश अधिक संपत्ति (जैसे सोना, स्टॉक, इक्विटी आदि) बेच रहा है या प्राप्त कर रहा है।

          इसे भी जानें :-

          भुगतान संतुलन में बीमा की क्या भूमिका है ?(What is the role of insurance in the balance of payments?)

          बीमा अर्थव्यवस्था के मुख्य और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। बीमा का मुख्य उद्देश्य लोगों को जोखिमों और खतरों से बचाना है। जैसा कि हम जानते हैं कि आधुनिक काल में बहुत अधिक दुर्घटनाएं, बुरी घटनाएं और अप्रत्याशित खतरे हैं। ये जोखिम सामाजिक जीवन में हर बार हो सकते हैं।

          भुगतान संतुलन में बीमा की मुख्य भूमिकाओं में से एक यह है कि, यह बीमा प्रीमियम एकत्र करके वित्तीय संसाधन उत्पन्न करता है। इन फंडों को सरकारी प्रतिभूतियों और स्टॉक में निवेश किया जाता है। यह प्रक्रिया प्रत्येक देश की विकास अर्थव्यवस्था को बढ़ाती है।और जब देश की अर्थव्यवस्था बढ़ता है तो देश के अंदर आयात कम होता है जिससे भुगतान संतुलन सुरक्षित रहता है और अनुकूल भुगतान संतुलन में वृद्धि होती है। 

          इसे भी पढ़े :-

          इस आर्टिकल में हमलोगो ने जाना की भुगतान संतुलन क्या है और भारत के भुगतान संतुलन में बीमा की क्या भूमिका है ?(What is balance of payments and what is the role of insurance in hindi),और भी बैलेंस ऑफ़ पेमेंट के बारे में ढेर सारी जानकारिया प्राप्त की जैसे की भुगतान संतुलन का क्या महत्व है ?भुगतान संतुलन कितने प्रकार के होते है ?अनुकूल भुगतान संतुलन क्या है  प्रतिकूल भुगतान संतुलन क्या है ?और प्रतिकूल भुगतान संतुलन के कारण क्या है आदि। यदि आपको ये आर्टिकल कैसा लगा अपना फीडबैक कमेंट में जरूर दे। 

          Post a Comment

          और नया पुराने